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तेजस्वी व अनंत की अजब दोस्‍ती, जिसे बताया बैड एलिमेंट उसी का ले रहे सहारा

तेजस्वी व अनंत की अजब दोस्‍ती, जिसे बताया बैड एलिमेंट उसी का ले रहे सहारा

सियासत की चाल सीधी नहीं,...Editor

सियासत की चाल सीधी नहीं, बल्कि आड़ी-तिरछी और टेढ़ी होती है। गठबंधन की गांठ भी 'हम बने तुम बने...' की तर्ज पर नहीं होती है। तत्काल फायदे के गणित पर सबकुछ निर्भर करता है। बिहार में आखिरी दौर के चुनाव में ऐसी चालें रंग दिखाने लगी हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव ने जिस बाहुबली विधायक अनंत सिंह को बैड एलिमेंट बताकर कांग्रेस को टिकट देने से रोकने की कोशिश की थी, आज चुनाव जीतने के लिए उसी एलिमेंट पर भरोसा जता रहे हैं।

तेजस्‍वी को चाहिए अनंत का सहारा

नेता प्रतिपक्ष वैशाली की लड़ाई में फंसे अपने प्रमुख नेता रघुवंश प्रसाद सिंह के समर्थन में अनंत सिंह का रोड शो ऐसे करा चुके हैं मानो अनंत कोई कद्दावर नेता हैं। सातवें दौर में पाटलिपुत्र संसदीय सीट पर अपनी बहन डॉ. मीसा भारती की जीत सुनिश्चित कराने के लिए भी तेजस्वी को अनंत के बाहुबल का सहारा चाहिए। इसके पहले तेजस्वी ने खुद अनंत के लिए चार-चार जनसभाएं की थी।

नई नहीं मतलब की यारी की कहानी

तेजस्वी और अनंत की दोस्ती के बहाने शुरू हुई मतलब की यारी की कहानी नई नहीं है। पिछले करीब दो दशकों से बिहार की राजनीति को गठबंधन के कारण जाना जाता है। भाजपा, जदयू, राजद और कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने वोट बैंक हथियाने के लिए जरूरत के हिसाब से दोस्ती की और तोड़ी भी। मतलब साफ कि जब वोटों की जरूरत पड़े तो दोस्ती पाक और जरूरत नहीं तो चेहरा दागदार

चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) प्रमुख जीतनराम मांझी, राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) की पहचान भी राजग के साथ जुड़ी ही हुई थी। गठबंधन में सीटों की अधिकतम भागीदारी के मुद्दे पर सभी बारी-बारी से छिटक गए। सबको राजद का माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण दिखा।

रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) अभी भाजपा-जदयू के साथ है, किंतु जरूरत के हिसाब से पासवान की भाजपा, राजद और कांग्रेस के प्रति आसक्ति घटती-बढ़ती रही है। इसी तरह लालू प्रसाद और नीतीश कुमार भी दोस्ती और दुश्मनी के दौर से गुजर चुके हैं। नीतीश कुमार और सुशील मोदी की सियासी कुंडलियों में भी ग्रह-नक्षत्र का संयोग बनते-बिगड़ते रहा है। रामविलास पासवान ने भी अपनी ही शर्तों पर किसी के ज्यादा करीब या दूरी बनाई है। सियासी दोस्ती के लिए पासवान की दरियादिली सब पर भारी है। उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति कभी नीतीश के बूते ही परवान चढ़ी थी। आज दोनों दूसरे के कïट्टर विरोधी हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कुशवाहा के साथ अरुण कुमार की अच्छी दोस्ती थी। अरुण जब सांसद बन गए तो दोस्ती में दरार आ गई। अभी जहानाबाद से निर्दलीय लडऩा पड़ रहा है। वैसे अरुण आशियाना बदलने में माहिर हैं। तीन दशकों की राजनीति में सारे घर घूम आए। अब शायद ही कोई घर वंचित रह गया होगा। जनाधिकार पार्टी के राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव भी अरुण कुमार की राह पर हैं। जीतनराम मांझी को नीतीश ने बिहार की राजनीति में एक ऊंचाई दी, किंतु आज दोनों दो ध्रुव पर खड़े हैं।

ये भी किसी से कम नहीं

पाला बदलकर राजनीति करने में दूसरी पंक्ति के नेता भी पीछे नहीं हैं। पाटलिपुत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे रामकृपाल यादव ने कभी लालू के सहारे ही सियासत की सीढिय़ां चढ़ी थी। आज विरोध में खड़े हैं। जदयू वाले श्याम रजक भी इधर-उधर हो चुके हैं। कभी लालू के करीबी थे, आज नीतीश के साथ हैं। जदयू प्रवक्ता संजय सिंह पहले पासवान के करीबी थे, आज नीतीश के हैं।

बिहार के दो-दो बार सीएम रह चुके डॉ. जगन्नाथ मिश्रा भी कई घरों का चक्कर लगा आए हैं। अभी कहां हैं, बेहतर वही बता सकते हैं। वैसे उनके पुत्र नीतीश मिश्र कुछ दिन पहले दरभंगा से भाजपा के टिकट के दावेदार थे।

पहले विरोध में, अब गोद में

बिहार में सियासी विडंबनाओं की भरमार है। नेताओं ने जब पाला बदला तो मौकापरस्ती की परिभाषा भी बदल दी। शरद यादव जब जैसा-तब तैसा के बड़े उदाहरण हैं। लालू की राजनीति का विरोध भी किया और मधेपुरा से चुनाव लड़कर हराया भी। आज जरूरत पड़ी तो गोद में भी बैठ गए। मंडल की राजनीति से पहले लालू प्रसाद ने कांग्रेस के विरोध के लिए भाजपा से भी परहेज नहीं किया था। लालू खुद को जेपी की संपूर्ण क्रांति की उपज बताते हैं। जेपी की यह क्रांति कांग्रेस के विरोध में हुई थी, लेकिन लालू आज कांग्रेस के साझीदार हैं।

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