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Sanchi के 200 साल रहे बेमिसाल, 31 जनवरी को होगा विशेष आयोजन

Sanchi के 200 साल रहे बेमिसाल, 31 जनवरी को होगा विशेष आयोजन

अंबुज माहेश्वरी, रायसेन।...Editor

अंबुज माहेश्वरी, रायसेन। विश्व प्रसिद्ध सांची के बौद्ध स्तूप सदियों तक मलबे में दबे रहे और जब वर्ष 1818 के अंत में इनकी खोज हुई तो बौद्ध धर्म से जुड़ा ऐसा इतिहास निकलकर सामने आया कि धीरे-धीरे पूरी दुनिया के बौद्ध अनुयायी शांति के इस तीर्थ के मुरीद हो गए।

सांची भारत और श्रीलंका के बीच बेहतर संबंधों का सेतु बनकर भी उभरा है। इन्हीं बौद्ध स्तूपों की खोज के 200 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में 31 जनवरी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भोपाल सर्किल द्वारा सांची स्थित संग्रहालय में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। जिसमें आठ घंटे तक 'खंडहर से पुनरुत्थान तक सांची गाथा" शीर्षक से सांची की गाथा सुनाई जाएगी। बीते 200 साल सांची के लिए बेमिसाल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1989 में विश्व धरोहर का दर्जा पाने वाले स्तूप को बीते साल भारतीय मुद्रा के 200 स्र्पए के नोट पर स्थान मिला।

श्रीलंका, जापान, भूटान, मलेशिया, ताईवान सहित अन्य कई बौद्ध अनुयायी देशों के लिए यह एक तीर्थ के रूप में स्थापित हो गया है। नवंबर माह के अंतिम सप्ताह के शनिवार और रविवार को लगने वाले सालाना अंतरराष्ट्रीय महाबोधि मेले में भी दुनियाभर के अनुयायी शामिल होने यहां आते हैं।

यह है इतिहास

प्रदेश के जाने माने पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास ने बताया कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक की पत्नी देवी ने जब बौद्ध धर्म स्वीकार किया था, तब उन्होंने सम्राट अशोक से कहकर ही यह स्तूप बनवाए थे। 11-12 वीं शताब्दी आने तक यह स्थान खंडहर में तब्दील होकर जमींदोज जैसी स्थिति में आ गया था।

सन 1818 के अंत में भोपाल रियासत के ब्रिटिश पॉलीटिकल एजेंट जनरल टेलर ने इन जमींदोज स्तूपों की खोज की थी। फिर वर्ष 1853 में सर्वेयर जनरल कनिंघम ने स्तूपों और आसपास के अवशेषों का सर्वे किया। फिर उत्खनन के बाद इन्हें नया रूप मिला।

वर्तमान में यहां बौद्ध मंदिर के तलघर में महात्मा गौतम बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र और महामोद्यलायन के अस्थि कलश रखे हैं। जो वर्ष में केवल एक बार वार्षिक बौद्ध मेले में दर्शन के लिए निकाले जाते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पहले निदेशक सर जॉन मार्शल ने वर्ष 1912 से 1919 तक स्तूपों का रखरखाव कराया। नवाबी शासनकाल में स्तूप की पहाड़ी से निकले अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए संग्रहालय बनाया गया।

सांची पर एक नजर

1818 में खोज और वर्ष 1853 में उत्खनन के बाद धीरे-धीरे बौद्ध धर्म का केंद्र बिंदु बनना शुरू हुआ।

1989 में मिला विश्व धरोहर का दर्जा।

अंतरराष्ट्रीय महाबोधि मेले के जरिए दुनिया भर से बौद्ध अनुयायियों का आना-जाना होने लगा।

31 अक्टूबर 2009 को श्रीलंका के तत्कालीन प्रधानमंत्री रत्नश्री विक्रमनायके यहां वंदना निकेतन का लोकार्पण करने आए।

21 सितंबर 2012 को श्रीलंका के राष्ट्रपति और भूटान के पीएम यहां सांची विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने आए।

सांची में ही प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि श्रीलंका में स्थित सीता माता मंदिर जाने पर अनुदान मिलेगा

श्रीलंका सरकार ने मंदिर को भव्य बनाने में सहयोग का कहा।

2018 में जारी हुए भारतीय मुद्रा के 200 स्र्पए के नोट पर स्तूप का चित्र अंकित किया गया

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