होलिका दहन की पौराणिक कथा, जब अग्नि भी प्रहलाद का बाल भी बांका न कर सकी

होलिका दहन की पौराणिक कथा, जब अग्नि भी प्रहलाद का बाल भी बांका न कर सकी
X

होली का पर्व रंगों और उल्लास का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी पौराणिक कथा छिपी है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव भी है। इस दिन विशेष रूप से होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का संदेश देता है।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक असुर राजा था, जिसे अपनी शक्ति और वरदान पर बहुत घमंड था। उसने अपने राज्य में स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था और आदेश दिया था कि कोई भी व्यक्ति विष्णु की उपासना न करे। लेकिन उसका पुत्र प्रहलाद परम भक्त था और हर समय भगवान विष्णु का स्मरण करता था।

हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई बार विष्णु भक्ति छोड़ने के लिए कहा, लेकिन प्रहलाद की आस्था अडिग रही। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे मारने के कई प्रयास किए, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद हर बार बच जाता था।

जब होलिका ने रची थी षड्यंत्र

आखिरकार, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। उसने एक चाल चली और प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का निश्चय किया, ताकि वह जलकर राख हो जाए और होलिका सुरक्षित बाहर आ जाए।

भगवान की कृपा से प्रहलाद बचा, होलिका जलकर भस्म हुई

जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी, तो आश्चर्यजनक रूप से प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ, लेकिन होलिका जलकर राख हो गई। इसका कारण यह था कि होलिका का वरदान तभी प्रभावी था जब वह अकेले अग्नि में प्रवेश करती, लेकिन जैसे ही उसने इस वरदान का दुरुपयोग किया, वह स्वयं भस्म हो गई।

भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित बच गए, और यहीं से असत्य पर सत्य की विजय की परंपरा की शुरुआत हुई। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत और अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

होलिका दहन का महत्व

* बुराई पर अच्छाई की जीत – यह त्योहार यह संदेश देता है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः धर्म की ही विजय होती है।

* आस्था और विश्वास – प्रहलाद की तरह यदि हमारी श्रद्धा और विश्वास अडिग हो, तो कोई भी विपत्ति हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

* नकारात्मकता का अंत – होलिका दहन को नकारात्मकता, ईर्ष्या, और अहंकार से मुक्त होने का प्रतीक भी माना जाता है।

* रंगों का त्योहार – होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी या रंगों की होली मनाई जाती है, जो प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक है।

होलिका दहन की विधि और शुभ मुहूर्त

होलिका दहन के लिए फाल्गुन पूर्णिमा की रात को एक विशेष मुहूर्त निकाला जाता है। इस दिन लकड़ियां और उपले (गोबर के कंडे) एकत्र कर एक चिता बनाई जाती है। फिर उसमें होलिका और प्रहलाद की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।

होलिका दहन की विधि:

. शुद्धिकरण: सबसे पहले स्थान को गंगाजल से पवित्र करें।

. लकड़ियों की व्यवस्था: होलिका दहन के लिए सूखी लकड़ियां और उपले रखें।

. होलिका और प्रहलाद की स्थापना: होलिका और प्रहलाद की मूर्ति स्थापित करें।

. पूजा और मंत्र जाप: पूजा में रोली, अक्षत, हल्दी, चंदन, फूल और नारियल चढ़ाएं।

. फेरियां लगाना: होलिका की परिक्रमा कर नारियल और गेंहू के पौधे चढ़ाएं।

. अग्नि प्रज्वलन: होलिका को अग्नि दी जाती है और लोग पारंपरिक भजन गाते हैं।

होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह हमें सिखाता है कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, यदि हमारी श्रद्धा और विश्वास दृढ़ है, तो कोई भी हमें हरा नहीं सकता। होली का यह पर्व सकारात्मकता, सौहार्द, और भाईचारे का संदेश देता है, जिससे समाज में प्रेम और आनंद बना रहे।

यह लेख/समाचार लोक मान्यताओं और जन स्तुतियों पर आधारित है। पब्लिक खबर इसमें दी गई जानकारी और तथ्यों की सत्यता या संपूर्णता की पुष्टि की नहीं करता है।

Tags:
Next Story
Share it