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कड़कड़ाती ठंड में 151 घड़ों से स्नान, चौबेपुर में हठयोग तपस्या का अद्भुत दृश्य

ब्रह्म मुहूर्त में ठंडे जल से स्नान, मारकंडेय महादेव धाम में 41 दिवसीय तपस्या बनी आस्था का केंद्र

कड़कड़ाती ठंड में 151 घड़ों से स्नान, चौबेपुर में हठयोग तपस्या का अद्भुत दृश्य
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कड़ाके की ठंड में भी अडिग आस्था

कड़ाके की ठंड और कंपकंपाती सुबह के बीच तापमान लगातार गिरता जा रहा है, लेकिन आस्था और साधना की तपिश हर चुनौती पर भारी दिख रही है। वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र में कैथी स्थित मारकंडेय महादेव धाम इन दिनों एक अद्भुत दृश्य का साक्षी बन रहा है, जहां संत श्री प्रद्युम्न महाराज जी 41 दिवसीय हठयोग तपस्या के तहत रोजाना बर्फ जैसे ठंडे जल से स्नान कर रहे हैं।

हठयोग तपस्या की कठिन परंपरा

इस हठयोग तपस्या की विशेषता इसकी अत्यंत कठिन साधना पद्धति है। नियम के अनुसार रातभर मिट्टी के घड़ों में जल भरकर खुले में रखा जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में ठीक तीन बजे संत उसी अत्यधिक ठंडे जल से स्नान करते हैं।

151 घड़ों से हुआ स्नान

शुक्रवार को तपस्या का 37वां दिन रहा। इस दिन संत श्री प्रद्युम्न महाराज जी को 151 घड़ों के बर्फ जैसे ठंडे जल से स्नान कराया गया। कड़कड़ाती ठंड के बीच यह दृश्य साधना की कठोरता और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक बन गया।

भोर में भक्तिमय वातावरण

भोर के समय गंगा घाट पर मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और श्रद्धालुओं की मौजूदगी से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। स्थानीय ग्रामीणों के साथ साथ दूर दराज से आए श्रद्धालु भी इस कठिन साधना के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे। ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी।

विश्व कल्याण के उद्देश्य से तपस्या

आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार यह तपस्या विश्व कल्याण के उद्देश्य से की जा रही है और अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। आयोजन के प्रबंधक अमित कुमार पांडेय ने बताया कि संत की साधना निरंतर नियम और संयम के साथ चल रही है।

5 जनवरी को होगा विशाल भंडारा

संत श्री प्रद्युम्न महाराज जी और आयोजन समिति के अनुसार 41 दिवसीय हठयोग तपस्या की पूर्णाहुति 5 जनवरी को होगी। इस अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सभी श्रद्धालुओं को आमंत्रित किया गया है।

आस्था और तप की जीवंत परंपरा

कड़कड़ाती ठंड में 151 घड़ों के जल से स्नान का यह दृश्य केवल साधना की कठोरता ही नहीं, बल्कि आस्था, संयम और तप की उस परंपरा का प्रमाण भी है, जो पीढ़ियों से भारतीय आध्यात्मिक चेतना का मजबूत आधार रही है।

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