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फिर से लिखी जाएगी इंसान के जीवित रहने की कहानी, चौबेपुर निवासी वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को वैश्विक शोध में मिली बड़ी जिम्मेदारी

चौबेपुर के सुंगुलपुर निवासी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को मानव विकास पर 85 मिलियन डॉलर की वैश्विक शोध परियोजना में बीएचयू की ओर से अहम भूमिका मिली।

फिर से लिखी जाएगी इंसान के जीवित रहने की कहानी, चौबेपुर निवासी वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को वैश्विक शोध में मिली बड़ी जिम्मेदारी
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वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र के निवासी प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे को मानव प्रजाति के विकास और अस्तित्व को समझने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय शोध कार्यक्रम में अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस परियोजना के तहत Banaras Hindu University को ऑस्ट्रेलिया की Griffith University के ARC Centre of Excellence for Transforming Human Origins Research में साझेदार संस्थान के रूप में शामिल किया गया है।


यह वही शोध केंद्र है, जिसे Australian Research Council की ओर से वर्ष 2026 से 2032 तक के लिए कुल 85 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला है। इस पहल का उद्देश्य यह समझ विकसित करना है कि होमो सेपियन्स पृथ्वी पर जीवित रहने वाली एकमात्र मानव प्रजाति कैसे बनी। इस शोध में अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के उन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाएगा, जिन पर अब तक अपेक्षाकृत कम काम हुआ है, और इसमें स्वदेशी समुदायों, ग्लोबल साउथ तथा पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक एक साथ मिलकर काम करेंगे।


बीएचयू की ओर से प्राणी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे को इस केंद्र में पार्टनर इन्वेस्टिगेटर नियुक्त किया गया है। वह मूल रूप से चौबेपुर क्षेत्र के सुंगुलपुर गांव के निवासी हैं। उनकी विशेषज्ञता जनसंख्या आनुवंशिकी, प्राचीन डीएनए और दक्षिण एशियाई आबादी के जनसांख्यिकीय इतिहास के अध्ययन में मानी जाती है।


प्रोफेसर चौबे ने बताया कि इस वैश्विक शोध पहल में पुरातत्व से जुड़े विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाएगा। इनमें डॉ सचिन के तिवारी, डॉ जोस टोम रैफेल और प्रतीक पांडेय शामिल हैं, जो परियोजना में सहयोग करेंगे।


इस सेंटर का उद्देश्य यह समझ विकसित करना है कि मानव प्रजाति होमो सेपियन्स पृथ्वी पर जीवित रहने वाली एकमात्र मानव प्रजाति कैसे बनी। शोध के तहत अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के उन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाएगा, जिन पर अब तक अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है। इसमें स्वदेशी समुदायों, ग्लोबल साउथ और पश्चिमी देशों के शोधकर्ताओं की संयुक्त भागीदारी होगी।

परियोजना से नए वैज्ञानिक मॉडल विकसित होने, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और नीतियों में मानव इतिहास से जुड़े संशोधनों तथा जैविक और सांस्कृतिक संबंधों की बेहतर समझ सामने आने की उम्मीद है। साथ ही मानव विकास के अध्ययन को अधिक समावेशी और नैतिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।


सेंटर के निदेशक प्रोफेसर माइकल पेट्राग्लिया ने कहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने ओल्ड वर्ल्ड की जनसंख्या को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार बीएचयू और अन्य साझेदार संस्थानों के साथ यह सहयोग मानव यात्रा को गहराई से समझने में सहायक होगा।


बीएचयू के कुलपति प्रोफेसर अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह साझेदारी जीवन विज्ञान, आनुवंशिकी और मानव उत्पत्ति से जुड़े अंतर्विषयक शोध में विश्वविद्यालय की भूमिका को मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि इससे छात्रों और शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शोध परियोजनाओं में भागीदारी के अवसर मिलेंगे।


इस वैश्विक शोध नेटवर्क में भारत की ओर से बीएचयू के साथ अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई भी शामिल है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, सऊदी अरब, चीन, इंडोनेशिया, श्रीलंका, यूरोप, यूनाइटेड किंगडम और कई स्वदेशी संगठनों की भागीदारी भी इस परियोजना का हिस्सा है।

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