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इथियोपिया के 12 हजार साल पुराने ज्वालामुखी के फटने से भारत में उड़ानों पर असर, उत्तर भारत में बढ़ रही है ठंड

इथियोपिया के 12 हजार साल पुराने ज्वालामुखी के फटने से भारत में उड़ानों पर असर, उत्तर भारत में बढ़ रही है ठंड
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इथियोपिया में लगभग बारह हजार साल से शांत पड़ा ज्वालामुखी अचानक जाग उठा और उसका जागना किसी पुराने किस्से जैसा शांत नहीं था। यह घटना स्थानीय लोगों के लिए एक तरह का झटका थी क्योंकि यह ज्वालामुखी आमतौर पर सोया हुआ माना जाता था। सुबह की हवा में जब राख का पहला गुबार उठा तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह कितनी दूर तक असर डालेगा। उसकी राख चौदह किलोमीटर ऊपर तक गई जिसने पूरे क्षेत्र को बेचैन कर दिया। आसपास के गांव राख से ढक गए और हालांकि जनहानि नहीं हुई लेकिन डर जरूर फैल गया।

ज्वालामुखी की राख साधारण धुएं की तरह हल्की नहीं होती। इसमें बारीक कांच के कण, टूटे हुए पत्थरों का महीन चूर्ण और कई तरह के खनिज शामिल रहते हैं। यह मिश्रण हवा में लंबा सफर तय करता है। यही इस बार भी हुआ। राख का गुबार इथियोपिया से उठा और धीरे धीरे रेड सी पार कर गया फिर यमन और ओमान को छुआ और उसके बाद पाकिस्तान से होता हुआ उत्तर भारत तक पहुंच गया। सतह पर रहने वाले लोगों ने कुछ खास महसूस नहीं किया क्योंकि यह राख ऊंचाई पर बहती चली गई। लेकिन आसमान में उड़ने वाले विमानों को इसने मुश्किल में डाल दिया।

दिल्ली और अन्य उत्तर भारतीय शहरों में पहले से ही प्रदूषण बढ़ा हुआ था। हवा का स्तर लगातार खराब चल रहा था और जब तक राख की पतली परत भारत की ओर बढ़ी तब तक हवा पहले ही जहरीली हो चुकी थी। जमीन पर रहने वालों को कोई सीधा खतरा नहीं पहुंचा लेकिन विमानन सेवाओं को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। कई उड़ानों को रद्द और कुछ को डायवर्ट करना पड़ा। एयर इंडिया, इंडिगो और अकासा एयर ने अपनी कई उड़ानें रद्द कीं। पश्चिम एशिया जाने वाले रूट सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

यह पहली बार नहीं है जब ज्वालामुखी की राख ने वैश्विक विमानन को प्रभावित किया हो। वर्ष 2010 में आइसलैंड के ज्वालामुखी ने यूरोप में हवाई सेवाओं को ठप कर दिया था। तीन सौ से ज्यादा हवाई अड्डे बंद पड़े थे और एक लाख उड़ानें रद्द हुई थीं। इससे पहले 1989 में अलास्का और 1982 में इंडोनेशिया के ऊपर उड़ते हुए दो विमानों के इंजन राख में फंसने से बंद हो गए थे। सौभाग्य से दोनों हादसों में सुरक्षित लैंडिंग हो गई थी।

यह सवाल अब भी बना रहता है कि उत्तर भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा। सच्चाई यह है कि जमीन पर रहने वाले लोग पहले से भारी प्रदूषण झेल रहे हैं। ज्वालामुखी द्वारा भेजी गई राख इतनी ऊंचाई पर थी कि उसका कण जमीन तक पहुंचने की संभावना बेहद कम थी। हवा का बहाव तेज रहा और राख आगे चीन की ओर बढ़ गई।

उत्तर भारत के मौसम पर अगर नजर डालें तो ठंड अब तेजी से बढ़ रही है। पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी शुरू हो चुकी है और इसका असर हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार तक जा रहा है। दिल्ली में सुबह कोहरा और दिन में ठंडी हवा रहने की संभावना है। पारा आठ से दस डिग्री तक गिर सकता है और दिन का तापमान चौबीस डिग्री के आसपास रहेगा।

ज्वालामुखी की राख आखिरकार आगे बढ़ गई लेकिन यह घटना एक बार फिर बता गई कि हमारी दुनिया कितनी गहराई से जुड़ी हुई है। एक ज्वालामुखी इथियोपिया में जागता है और सात हजार किलोमीटर दूर भारत में उड़ानें रद्द हो जाती हैं। मौसम हो या वातावरण, सीमाएं कभी आसमान को रोक नहीं पातीं।

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