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एक इंजेक्शन में 6 महीने तक कंट्रोल रहेगा BP, BHU सहित कई संस्थानों के शोध ने खोला हाई ब्लड प्रेशर इलाज का नया रास्ता

रोज दवा खाने की मजबूरी से जल्द मिल सकती है राहत, वाराणसी में कार्डियोलॉजी संगोष्ठी में सामने आए अहम संकेत

एक इंजेक्शन में 6 महीने तक कंट्रोल रहेगा BP, BHU सहित कई संस्थानों के शोध ने खोला हाई ब्लड प्रेशर इलाज का नया रास्ता
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हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए आने वाला समय बड़ी राहत लेकर आ सकता है। रोजाना दवा खाने की मजबूरी से जल्द निजात मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। आधुनिक तकनीक से तैयार की जा रही नई दवाओं के जरिए ऐसा इंजेक्शन विकसित किया जा रहा है, जिससे एक बार लेने पर छह महीने तक बीपी नियंत्रित रह सकेगा। यह जानकारी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कार्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर विकास अग्रवाल ने वाराणसी में आयोजित एक वैज्ञानिक संगोष्ठी में दी।

ताज होटल में यूपी कार्डियोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया और हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी में देश के कई वरिष्ठ चिकित्सकों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया। प्रो. विकास अग्रवाल ने बताया कि बीएचयू सहित कई संस्थान इस दिशा में शोध कर रहे हैं और भविष्य में यह तकनीक आम मरीजों के लिए उपलब्ध हो सकेगी। इससे हाई बीपी के इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि जिन मरीजों का बीपी दवाओं से नियंत्रित नहीं हो पाता, उनके लिए रिनल डिनर्वेशन एक प्रभावी विकल्प बनता जा रहा है। इसमें किडनी की धमनियों को नियंत्रित तरीके से गर्म कर बीपी को संतुलित किया जाता है। इस प्रक्रिया से तीन साल तक ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रह सकता है।

यूपी कार्डियोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. अजय पांडे ने कहा कि इस तरह की संगोष्ठियां डॉक्टरों को नई तकनीकों और शोध से जोड़ने का काम करती हैं। अलग-अलग शहरों से आए विशेषज्ञों ने भविष्य में हृदय रोगों के इलाज को लेकर अपने अनुभव और सुझाव साझा किए।

हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के निदेशक डॉ. आकाश राय ने बताया कि ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता सुधार की दिशा में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस तरह की अकादमिक गतिविधियों को जारी रखने की बात कही।

संगोष्ठी में कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पी. आर. सिन्हा ने हृदय की धमनियों में कैल्शियम जमा होने को एक गंभीर चेतावनी बताया। उन्होंने कहा कि यह संकेत है कि व्यक्ति भविष्य में हार्ट डिजीज का शिकार हो सकता है। कंट्रास्ट तकनीक से यह पता लगाया जा सकता है कि धमनियों में रुकावट कितनी है। जितनी ज्यादा रुकावट, उतना बड़ा खतरा। उन्होंने यह भी सलाह दी कि जिन मरीजों को किडनी की समस्या है, उन्हें कम कंट्रास्ट वाली विधि से जांच करानी चाहिए।

केजीएमयू लखनऊ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आयुष शुक्ला ने दिल की धड़कन से जुड़ी एक गंभीर समस्या एवीएनआरटी पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि इस स्थिति में बिना किसी शारीरिक मेहनत के दिल की धड़कन अचानक 140 से 250 प्रति मिनट तक पहुंच सकती है। यह एक खतरनाक स्थिति हो सकती है, जिसे समय पर पहचानना जरूरी है।

डॉ. शुक्ला ने कहा कि ईसीजी के जरिए धड़कन की गड़बड़ियों की पहचान संभव है, लेकिन एवीएनआरटी और एवीआरटी जैसी स्थितियों के बीच सही फर्क समझने के लिए ईपी स्टडी सबसे सटीक तरीका है। हालांकि दोनों में लक्षण मिलते-जुलते हैं, पर उनकी वजह अलग होती है और इलाज की रणनीति तय करने में सही पहचान जरूरी है।

इस संगोष्ठी में प्रो. सोमित घोष, डॉ. आशीप जायसवाल, डॉ. अमित सिंह और डॉ. पंकज सिंह सहित कई विशेषज्ञों ने अपने शोध और अनुभव साझा किए। चर्चा का केंद्रीय बिंदु यही रहा कि भविष्य में दिल और ब्लड प्रेशर से जुड़ी बीमारियों का इलाज अधिक सटीक, कम दवा-निर्भर और लंबे समय तक प्रभावी बनाने की दिशा में चिकित्सा विज्ञान तेजी से आगे बढ़ रहा है।

हाई बीपी जैसे आम लेकिन गंभीर रोग के इलाज में यदि छह महीने तक असर करने वाला इंजेक्शन सफल होता है, तो यह लाखों मरीजों के जीवन को आसान बनाने वाला बदलाव साबित हो सकता है।

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