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पश्चिम बंगाल में मोदी का तूफानी दौरा: क्या तीन जिलों की ये रैलियां बदल देंगी सियासी समीकरण?

चुनावी रणभेरी के बीच बंगाल की धरती पर पीएम का दूसरा कदम, रैलियों के पीछे छिपे बड़े सियासी संकेत।

पश्चिम बंगाल में मोदी का तूफानी दौरा: क्या तीन जिलों की ये रैलियां बदल देंगी सियासी समीकरण?
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लोकसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीतिक फिजां एक बार फिर गरमा गई है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के तीन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर भाजपा के अभियान को एक नई धार दे दी है। हल्दिया, आसनसोल और सूरी में प्रधानमंत्री की इन बैक-टू-बैक सभाओं को केवल चुनावी रैलियों के तौर पर नहीं, बल्कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी के अभेद्य किलों में सेंध लगाने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सुबह 9:30 बजे पूर्व मेदिनीपुर के औद्योगिक केंद्र हल्दिया से शुरू हुआ यह सिलसिला दोपहर होते-होते आसनसोल के पोलो ग्राउंड और फिर बीरभूम के सूरी तक जा पहुँचा, जिससे पूरे दक्षिण बंगाल में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।


प्रधानमंत्री का यह दौरा चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के बाद बंगाल का दूसरा बड़ा प्रवास है, जो राज्य के प्रति भाजपा की गंभीरता को दर्शाता है। इससे पहले 5 अप्रैल को उत्तर बंगाल के कूचबिहार में अपनी पहली रैली के दौरान उन्होंने 'भय बनाम भरोसा' का नारा देकर सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के शासन मॉडल को चुनौती दी थी। जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री का बार-बार बंगाल आना और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरना, उन मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश है जो विकास और सुरक्षा के नाम पर बदलाव की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हल्दिया की रैली के साथ उन्होंने पूर्वी मेदिनीपुर के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा, तो वहीं आसनसोल के औद्योगिक बेल्ट में श्रमिक वर्ग और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास किया।


बीरभूम जिले के सूरी में आयोजित दिन की अंतिम रैली प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील मानी जा रही है, क्योंकि यह इलाका लंबे समय से राजनीतिक रस्साकशी का केंद्र रहा है। चांदमारी मैदान में उमड़ी भीड़ और प्रधानमंत्री के संबोधन के बीच स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित हुई। इन रैलियों के माध्यम से भाजपा न केवल अपने वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, बल्कि उन क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है जहाँ टीएमसी का सांगठनिक ढांचा बेहद मजबूत माना जाता है। स्थानीय लोगों के बीच भी इन दौरों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है; जहाँ भाजपा समर्थक इसे 'परिवर्तन की लहर' बता रहे हैं, वहीं विपक्षी खेमा इसे केवल चुनावी स्टंट करार दे रहा है।

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