प्रयागराज कोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला, जिसने दरिंदगी की हदें पार करने वाले अपराधी के लिए मुकर्रर की मौत!
सोरांव की उस मासूम के साथ हुई क्रूरता पर कानून का सबसे सख्त प्रहार, न्याय की मेज पर जब गूंजा फांसी का आदेश.

उत्तर प्रदेश के न्याय के केंद्र प्रयागराज से एक ऐसी खबर आई है, जिसने समाज में कानून के इकबाल को एक बार फिर बुलंद कर दिया है। पॉक्सो कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए अपराधी को ऐसी सजा दी है, जो नजीर बन गई है। यह मामला केवल एक कानूनी कार्यवाही भर नहीं है, बल्कि उस अकल्पनीय क्रूरता का अंत है जिसने सोरांव इलाके को हिलाकर रख दिया था। एक आठ वर्षीय मासूम के साथ हुई अमानवीयता पर अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि समाज में ऐसे कृत्य के लिए कोई जगह नहीं है और न्याय का तराजू ऐसे अपराधियों के लिए रत्ती भर भी रियायत नहीं बरत सकता। विशेष न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे अत्यंत जघन्य श्रेणी में रखा है।
इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह घटना मुकेश पटेल नाम के व्यक्ति की मानसिक विकृति और क्रूरता की कहानी बयां करती है। आरोप था कि सोरांव क्षेत्र में रहने वाली एक छोटी बच्ची को न केवल हवस का शिकार बनाया गया, बल्कि उसकी निर्मम हत्या कर साक्ष्य मिटाने की कोशिश भी की गई। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने पुख्ता सबूतों की एक ऐसी कड़ी पेश की, जिसने बचाव पक्ष की हर दलील को कमजोर कर दिया। पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का गहन अवलोकन करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि दोषी को समाज में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय ने मुकेश पटेल को फांसी की सजा सुनाते हुए उस पर 25 हजार रुपए का आर्थिक दंड भी आरोपित किया है।
कोर्ट रूम में जब इस फैसले की घोषणा हुई, तो वहां मौजूद हर शख्स की नजरें न्याय की उस शक्ति पर टिकी थीं, जो पीड़ित परिवार के आंसुओं का हिसाब मांग रही थी। जज ने अपने आदेश में साफ तौर पर दर्ज किया कि यह अपराध 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी को छूता है, जहाँ एक मासूम का बचपन उजाड़ने के बाद उसे मौत के घाट उतार दिया गया। इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों से लेकर आम जनता के बीच सुरक्षा और न्याय को लेकर एक नई चर्चा छिड़ गई है। जानकारों का मानना है कि फांसी की यह सजा भविष्य में ऐसे अपराधियों के मन में खौफ पैदा करेगी। फिलहाल, इस निर्णय को एक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि कानून की नजरों से बच पाना और मासूमों के खिलाफ हिंसा करना अब बहुत महंगा पड़ेगा।
