सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ी है खिचड़ी और तिल की परंपरा, बदलते मौसम में सेहत और आस्था का संगम
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ी है खिचड़ी और तिल की परंपरा, बदलते मौसम में सेहत और आस्था का संगम

हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का पर्व विशेष धार्मिक और प्राकृतिक महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर यानी मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी खगोलीय परिवर्तन के साथ सूर्य की उत्तरायण यात्रा शुरू होती है, जिससे ऋतु परिवर्तन की प्रक्रिया भी आरंभ हो जाती है। ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और वसंत ऋतु की ओर मौसम बढ़ने लगता है। ऐसे में मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलाव का भी प्रतीक मानी जाती है।
मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन अन्न दान करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। खिचड़ी दाल और चावल से बनती है, जो संपूर्ण अन्न का प्रतीक है। माना जाता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और अन्न की कमी नहीं होती। कई क्षेत्रों में इसी वजह से इस पर्व को ‘खिचड़ी पर्व’ के नाम से भी जाना जाता है।
तिल का महत्व भी मकर संक्रांति से गहराई से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों में तिल को पवित्र माना गया है और दान-पुण्य में इसका विशेष स्थान है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन तिल का दान और सेवन करने से पापों का नाश होता है। तिल को सूर्य देव से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि यह शरीर में ऊष्मा बढ़ाता है और ठंड के प्रभाव को कम करता है। यही कारण है कि इस दिन तिल-गुड़ के लड्डू, तिलकुट और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी खिचड़ी और तिल का सेवन मकर संक्रांति के समय बेहद लाभकारी माना जाता है। मौसम के बदलाव के दौरान पाचन तंत्र कमजोर हो सकता है, ऐसे में खिचड़ी हल्की और सुपाच्य होती है। वहीं तिल शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ ठंड से बचाने में मदद करता है। इस तरह मकर संक्रांति पर खिचड़ी और तिल की परंपरा धार्मिक आस्था, आयुर्वेदिक ज्ञान और मौसमी जरूरतों का सुंदर मेल मानी जाती है।
