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यूपी के शहरों में 'छुट्टी' के वक्त थमने वाली रफ्तार पर बड़ा फैसला: क्या 15 मिनट का यह फॉर्मूला बदल देगा सड़कों की सूरत?

सड़कों पर बढ़ते दबाव और स्कूल टाइमिंग के बीच पैदा होने वाले गतिरोध को खत्म करने के लिए शासन की नई रणनीति, अब जवाबदेही के साथ बदलेंगे नियम।

यूपी के शहरों में छुट्टी के वक्त थमने वाली रफ्तार पर बड़ा फैसला: क्या 15 मिनट का यह फॉर्मूला बदल देगा सड़कों की सूरत?
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उत्तर प्रदेश के महानगरों में दोपहर के समय सड़कों पर लगने वाला अंतहीन जाम अब केवल एक यातायात समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती बन गया है। विशेष रूप से स्कूलों की छुट्टी के वक्त जब हजारों बच्चे, बसें और अभिभावक एक साथ सड़कों पर उतरते हैं, तो पूरे शहर की रफ्तार जैसे थम सी जाती है। इस पुरानी और पेचीदा समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए शासन ने अब एक बेहद कड़े और व्यावहारिक ब्लूप्रिंट पर काम शुरू कर दिया है। सरकार की ओर से जारी नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के केंद्र में वह '15 मिनट का अंतराल' है, जिसके जरिए भीड़ के दबाव को टुकड़ों में बांटने की कोशिश की जाएगी। यह महज एक सुझाव नहीं है, बल्कि उस अव्यवस्था को व्यवस्थित करने का प्रयास है जिसने बरसों से आम शहरी का समय और सुकून छीना है।


प्रशासन की इस नई योजना के तहत सबसे क्रांतिकारी कदम स्कूलों और पास के दफ्तरों के छूटने के समय में बदलाव को लेकर उठाया गया है। नई एसओपी में स्पष्ट सिफारिश की गई है कि एक ही क्षेत्र में स्थित शिक्षण संस्थानों और कार्यालयों के समय में कम से कम 15-15 मिनट का अंतर रखा जाए, ताकि सड़कों पर वाहनों का रेला एक साथ न उमड़े। इसके साथ ही, अब ट्रैफिक विभाग के आला अधिकारियों से लेकर थानों के प्रभारियों तक की जिम्मेदारी व्यक्तिगत रूप से तय कर दी गई है। अब सड़क पर जाम लगने की स्थिति में केवल निचले स्तर के कर्मचारी नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारी भी जवाबदेह होंगे। शासन का मानना है कि जब तक जवाबदेही का स्तर ऊपर से तय नहीं होगा, तब तक सड़कों पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है।


इस नई व्यवस्था में केवल समय के हेरफेर पर ही ध्यान नहीं दिया गया है, बल्कि उन बुनियादी वजहों पर भी प्रहार किया गया है जो जाम को बढ़ावा देती हैं। 'नो एंट्री' के नियमों का सख्ती से पालन, 'नो पार्किंग' जोन में खड़े वाहनों पर त्वरित कार्रवाई और गलत दिशा में ड्राइविंग करने वालों के खिलाफ कड़े रुख के निर्देश दिए गए हैं। शहरों के भीतर ई-रिक्शा के बेलगाम संचालन और सड़कों के किनारे होने वाले अवैध अतिक्रमण को भी इस नई रणनीति के दायरे में रखा गया है। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की मानें तो यदि ई-रिक्शा के रूट और स्कूलों के सामने पार्किंग का सही प्रबंधन हो जाए, तो स्थिति में काफी सुधार आ सकता है। अब देखना यह होगा कि जमीनी स्तर पर पुलिस और प्रशासन इन सख्त निर्देशों को कितनी तत्परता से लागू करते हैं, क्योंकि कागजों पर बनी यह रणनीति सड़कों पर तभी सफल होगी जब हर मोड़ पर मुस्तैदी दिखाई देगी।

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