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देश विभाजन: मौलवीजी को अचानक ख्याल आया भगवान तो सभी का एक है

देश विभाजन: मौलवीजी को अचानक ख्याल आया भगवान तो सभी का एक है

बलौच सिपाही मिल्टरी के ट्रक...Editor

बलौच सिपाही मिल्टरी के ट्रक में मुर्गों की तरह लद गए थे। उनका सामान वैपन-कैरियर में सुबह भेज दिया गया था। हर फौजी के पास सिर्फ अपनी-अपनी बंदूक थी। समय ही कुछ ऐसा था कि बंदूकों पर संगीनें हर समय चढ़ी रहती थीं।

बलौच फौजियों की इस टुकड़ी का सरदार एक रमजान खान नाम का जमादार था, जिसे सभी 'मौलवी जी, मौलवी जी' कहते थे। चलती लारी में जमादार नमाज पढ़ने के लिए खड़े हो जाते। फसादों में लाशों के ढेर के आगे मुस्सला बिछाकर लोगों ने नमाज के समय उन्हें नमाज पढ़ते देखा था। एक सिपाही उनकी दाईं तरफ बंदूक लेकर खड़ा होता और एक सिपाही उनकी बाईं तरफ। देश विभाजन के बाद अमृतसर क्षेत्र से मुसलमानों को निकाल-निकालकर वे पाकिस्तान भेजते।
जली हुई मस्जिदों के सामने लारी रुकवाकर ये रोने लगते। कोई भी मुसलमान ऐसा नहीं रह गया था, जिसे मौलवी ने पाकिस्तान की स्वर्ग-सी जमीन पर न भिजवा दिया हो। जो अपने घरबार छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें मौलवी जी इस्लामी राज्य के सुंदर चित्र दिखाते और कोई भी उनका कहना टाल न पाता। आज अब मौलवीजी को अचानक ख्याल आया भगवान, तो सभी का एक है।
अमृतसर के हरिमंदिर की नींव एक मुसलमान फकीर ने रखी थी, गुरु नानक को अहले-सुन्नत भी अपना पीर मानते हैं और मौलवी जी ने दूर गुरुद्वारे के चमकते हुए सुनहरे कलशों को देखकर सिर झुका दिया।
लॉरी चली, तो ठंडी हवा के पहले झोंके के साथ ही मौलवी जी की आंखें मुंदने लगीं। वीभत्स दृश्य उनकी आंखों के सामने उभरने लगे। किस तरह मुसलमानों ने हिंदू-सिखों के टुकड़े-टुकड़े किए थे और किस तरह हिंदू-सिखों ने मुसलमानों से गिन-गिनकर बदले लिए थे। जमादार रमजान खान ऐसे ही ख्यालों में खोया हुआ था कि सड़क से एक खौंफनाक चीख के बाद ट्रक में सिपाहियों के हंसने की आवांज आई।
पूछने पर पता चला कि साइकिल पर जा रहे नौजवान सिख के पास से जब लारी गुजरी, तो लारी के एक सिपाही ने अपनी संगीन से उसके गले को छलनी कर दिया। वह सिख साइकिल से उछलकर नाली में गिर पड़ा जैसे कोई मेंढक उछलकर गिरता है। इसी घटना पर सिपाही हंस रहे थे। जमादार भी सिख को मारने की इस तरकीब पर हंसने लगा। उसने सोचा चलो एक सिखड़ा और कम हुआ। ट्रक से हंसी अभी थमी नहीं थी कि सड़क से फिर एक भयानक चीख सुनाई दी।
इस बार आवाज किसी औरत की थी और लारी में कहकहों की आवाज और ऊंची हो गई। दूध बेचकर गांव जा रही किसी ग्वालिन को इस बार निशाना बनाया गया था। संगीन की नोक ग्वालिन की चोटी में जाकर लगी थी और उसके बालों की लट संगीन के साथ कट कर आ गई थी और ग्वालिन का बर्तन एक तरफ गिर गया था और ग्वालिन दूसरी तरफ ढेर हो गई थी। जब सभी ने अरमान पूरे कर लिए, तो जमादार ने बालों की लट लेकर अपनी डायरी में रख ली। काफिरों के मुल्क की यह निशानी भी अच्छी रहेगी, उसने मन-ही-मन सोचा।
सुबह की ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। अमृतसर शहर के बाहर सड़क पर कोई इक्का-दुक्का ही आ-जा रहा था।
बलौच फौंजियों ने पाकिस्तान की शान में गीत गाने प्रारंभ कर दिए 'पाकिस्तान आसमान में चमकता एक तारा है, पाकिस्तान दुनिया में इनसाफ का एक नमूना होगा पाकिस्तान गरीबों और अनाथों का सहारा होगा पाकिस्तान में न कोई जालिम होगा, न कोई मजलूम...।' इसी तरह गाते-गाते एक सिपाही ट्रक में ड्राइवर के दाहिने आकर बैठ गया, दूसरा जमादार से इजाजत लेकर उनके बाईं और बैठ गया। और संगीनों को उन्होंने बाहर निकालकर रख लिया जैसे कोई शिकारी की घात में बैठा हुआ हो। सड़क पर फिर एक औरत नजर आई, गले में गातरे वाली कृपाण, कोई सिख नजर आ रही थी।
ड्राइवर ने धीरे-से ट्रक को उसके पास से निकाला और सुनसान सड़क पर फिर एक चीख सुनाई दी। ट्रक में फिर कहकहे उठे। ड्राइवर ने फिर ट्रक को तेज कर लिया। और जहां जाकर वह औंधी गिरी, दूर तक सिपाही एड़ियां उठाकर उसे तड़पते हुए देखते रहे। फिर उसके संबंध में बातें होने लगीं। कोई कहता गुरुद्वारे से आ रही थी, तो दूसरा कहता गुरुद्वारे जा रही थी। जमादार को समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी डायरी में दुश्मनों के जानी नुकसान के हिसाब में एक औरत लिखे या एक औरत और एक बच्चा।
कोई एक मील बाद एक बूढ़ा सड़क के किनारे बैठा पेशाब कर रहा था। लारी फिर सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते पर आ गई। इस बार जमादार के बाईं ओर बैठे सिपाही ने बूढ़े की पीठ में संगीन को गाढ़ दिया। बूढ़ा गेंद-सा लुढ़कता खाई में गिर गया। फिर एक चीख और फिर कहकहे। जमादार रमजान खान ने सोचा जाते-जाते ये अच्छे शिकार मिल गए। वह बार-बार डायरी खोलता और अपने हिसाब को अप-टू-डेट करता।
शहर से जैसे-जैसे वे दूर होते जा रहे थे, वैसे-वैसे खतरा कम होता जा रहा था। हवा से बातें करता का ट्रक जैसे उड़ता जा रहा था। सामने सीमा पर पाकिस्तानी झंडा दिखाई देने लगा था। बलौच सिपाहियों ने झंडे को देखते ही 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के पांच नारे लगाए और फिर कोई नगमा गाने लगे। थोड़ा ही आगे जाकर बलौच सिपाहियों ने देखा कि तीन सिख सड़क पर जा रहे थे, दो-दो दाईं ओर और एक बाईं ओर। तीनों में कोई पचास-पचास कदमों का अंतर था। ड्राइवर के पास अगली सीट पर बैठे बलौच सिपाहियों ने आंखों-आंखों से कोई योजना बनाई और जब सारा नक्शा इशारों से सभी की समझ में आ गया, तो तीनों मुस्करा दिए।
फिर ड्राइवर ने ट्रक को दाईं ओर कच्चे रास्ते पर डाल दिया। अगले ही क्षण एक नौजवान सिख संगीन की नोक से बिंध गया। ट्रक तेज हो गया। नौजवान की चीख सुनकर उसी ओर जा रही औरत ने हैरानी और घबराहट से पीछे मुड़कर देखा। ट्रक उस समय तक उसके सिर पर पहुंच चुका था और तेजी से बाहर आती संगीन उसकी छाती में गढ़ गई। ट्रक और तेज हो गया। अब बाईं ओर जा रहे बूढ़े की बारी थी। ड्राइवर बड़े साहस से ट्रक को सड़क पर ले आया और फिर बाईं ओर कच्चे रास्ते पर डाल दिया। संगीन की नोंक चुभते ही बूढ़ा उछला और पहिये के आगे जा गिरा। ड्राइवर ने ट्रक को और तेज कर दिया।
​सामने दिख रहा पाकिस्तान का धर्म, सच और न्याय का प्रतीक चांद-तारे वाला झंडा लहरा रहा था। ड्राइवर ने ट्रक को और तेज कर दिया। अपने देश से आ रही प्यार-भरी तेज हवाएं जैसे बलौच सिपाहियों का स्वागत कर रही थीं और एक नशे में बलौच सिपाही 'अल्लाह हू अकबर' और 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। तभी ड्राइवर ने देखा कि अचानक एक जंगली बिल्ली कूद कर सड़क के बीच में आ गई।
'इंसानियत का तकाजा...' इस तरह हुक्म उसके मुंह में ही था कि ड्राइवर ने खुद ही ट्रक को एक तरफ करते हुए बिल्ली को बचाने की कोशिश की। बिल्ली, तो बच गई, पर इतनी तेज जा रहे ट्रक कर हैंडल मुड़ा तो फिर संभल न सका। ट्रक कच्चे रास्ते पर आ गया, फिर कच्चे रास्ते से उतर कर एक पेड़ से टकराकर उलट गया। ट्रक ने एक करवट ली, फिर दूसरी। पच्चीस मिली-जुली चीखें निकलीं। और फिर जैसे सभी के गले पकड़ लिए गए हों, एकदम सन्नाटा छा गया।
इंजन के पेट्रोल से ट्रक में आग लग गई। सड़क पर कोई भी हिंदुस्तानी नहीं था, जो बलौच सिपाहियों की मदद के लिए पहुंचता। दूर दिख रहा पाकिस्तान का झंडा वैसे ही लहरा रहा था। घबराहट में सड़क के किनारे कीकर के पेड़ पर बिल्ली चढ़ गई थी और वहीं से आंखें फाड़े जल रहे ट्रक को देख रही थी।
(पंजाबी से अनुवाद : कीर्ति केसर)

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